नेपाल की विनाशकारी बाढ़ के बीच एक शिक्षक की सूझबूझ ने 1,643 बच्चों की जिंदगी बचा ली. प्रिंसिपल राजेंद्र दवाड़ी ने खतरे की आहट मिलते ही ऐसा फैसला लिया कि कुछ ही देर बाद बाढ़ में स्कूल की इमारत तबाह हो गई, लेकिन उसके सभी बच्चे सुरक्षित निकल चुके थे. नेपाल में आई विनाशकारी फ्लैश फ्लड ने कई इलाकों को मलबे में बदल दिया. तेज पानी के साथ बर्फ, चट्टान, कीचड़ और मलबा नीचे आया और रास्ते में आने वाली इमारतों, पुलों और दूसरे ढांचों को बहाता चला गया. इसी दौरान नुवाकोट की त्रिशूली घाटी में एक स्कूल भी इस सैलाब की चपेट में आ गया.
लेकिन इस स्कूल की कहानी बाकी जगहों से अलग है. जिस वक्त बाढ़ का खतरा सामने था, वहां 1,643 बच्चे मौजूद थे. उनके सामने सबसे बड़ी चुनौती थी कि इतने बच्चों को कुछ ही मिनटों में सुरक्षित कैसे निकाला जाए. इसी मुश्किल वक्त में स्कूल के प्रधानाचार्य राजेंद्र दवाड़ी ने मोर्चा संभाला. उन्होंने खतरे को समझा, स्कूल खाली कराया और बच्चों को ऊंचाई की ओर भेज दिया. कुछ देर बाद बाढ़ ने स्कूल की इमारत को तबाह कर दिया.
कौन हैं प्रिंसिपल राजेंद्र दवाड़ी?
राजेंद्र दवाड़ी नेपाल के नुवाकोट जिले की त्रिशूली घाटी में स्थित त्रिभुवन त्रिशूली माध्यमिक विद्यालय के प्रधानाचार्य और अंग्रेजी शिक्षक हैं. वह करीब 47 साल के हैं और वर्षों से बच्चों को पढ़ाने के साथ स्कूल की जिम्मेदारी संभाल रहे हैं. अगस्त 2026 में नेपाल-तिब्बत सीमा के आसपास आई भयावह फ्लैश फ्लड के दौरान दवाड़ी का नाम इसलिए चर्चा में आया क्योंकि उन्होंने संकट की घड़ी में मौजूद 1,643 बच्चों को सुरक्षित निकालने में अहम भूमिका निभाई.
स्थानीय लोगों ने उन्हें बच्चों की जान बचाने के लिए हीरो कहा, लेकिन दवाड़ी खुद इसे कोई असाधारण काम नहीं मानते. उनका कहना है कि वह वही कर रहे थे, जो उस समय एक शिक्षक और प्रधानाचार्य को करना चाहिए था. लेकिन जिस परिस्थिति में उन्होंने यह फैसला लिया, उसे देखते हुए उनकी कहानी बेहद खास बन जाती है.
बाढ़ आने से कुछ मिनट पहले आया फोन
बुधवार की सुबह करीब 9:20 बजे राजेंद्र दवाड़ी को एक दोस्त का फोन आया. दोस्त ऊंचाई वाले इलाके में था और उसने उन्हें चेतावनी दी कि पानी तेजी से बढ़ रहा है और गांव की तरफ बाढ़ का खतरा पहुंच चुका है. दवाड़ी ने शुरुआत में स्कूल को सुरक्षित माना था. स्कूल कंक्रीट से बना था और नदी से करीब 60 मीटर ऊपर स्थित था. जिस स्तर पर स्कूल बना था, उसी के आसपास गांव को दूसरी तरफ जोड़ने वाला स्टील का पुल भी था यानी पहली नजर में ऐसा नहीं लग रहा था कि कुछ ही मिनटों में स्कूल को खाली कराने की जरूरत पड़ सकती है लेकिन स्थिति तेजी से बदल रही थी.
एक अभिभावक की बात ने बदल दिया फैसला
फोन के कुछ समय बाद एक अभिभावक स्कूल पहुंचा. उसने बताया कि नदी का पानी तेजी से ऊपर आ रहा है. अब दवाड़ी के सामने सिर्फ दो विकल्प थे या तो स्कूल को सुरक्षित मानकर बच्चों को वहीं रहने दिया जाए या खतरा बढ़ने से पहले पूरी इमारत खाली करा दी जाए. उन्होंने इंतजार नहीं किया. स्कूल की घंटी बजाई गई और बच्चों को बाहर निकालने का निर्देश दे दिया गया. 1643 बच्चों को निकालने के लिए शुरू हुआ रेस्क्यू. राजेंद्र दवाड़ी ने शिक्षकों को तुरंत कक्षाएं खाली कराने के लिए कहा. स्कूल बस चालकों को भी फोन किया गया और लगभग सभी ड्राइवरों को वापस लौटने के निर्देश दिए गए.
इसी दौरान एक बस ऐसी थी, जिससे संपर्क नहीं हो पाया. दवाड़ी ने देखा कि वह बस पुल पार कर रही है. हालात इतने तेजी से बदल रहे थे कि बच्चों को भी खतरे का अहसास होने लगा था. एक बच्ची घबराहट में पैनिक अटैक की स्थिति में पहुंच गई. उसे मोटरसाइकिल के जरिए ऊंचाई वाले इलाके में ले जाया गया. बाकी बच्चे पैदल ही सुरक्षित स्थान की ओर जाने लगे. दवाड़ी बच्चों के पीछे-पीछे तब तक चलते रहे, जब तक उन्हें सुरक्षित जगह नहीं मिल गई.
छोटे बच्चों को गोद में उठाकर ऊंचाई की तरफ भागे
बाढ़ से बचने के लिए बच्चों को ऊंचे स्थान की तरफ ले जाया गया. इस दौरान बड़े बच्चों और शिक्षकों ने छोटे बच्चों की मदद की. कई छोटे बच्चों को गोद में उठाकर आगे ले जाया गया. हर किसी की कोशिश थी कि पानी का स्तर बढ़ने से पहले स्कूल परिसर से बाहर निकला जा सके. आखिरकार बच्चे एक बोधि के पेड़ के नीचे सुरक्षित जगह पर पहुंच गए और इसके कुछ ही समय बाद वह हुआ, जिसका शायद किसी ने अनुमान नहीं लगाया था.
बच्चों के निकलते ही बाढ़ ने स्कूल को बना दिया मलबा
जिस स्कूल में कुछ देर पहले तक 1,643 बच्चे मौजूद थे, वहां बाढ़ का सैलाब पहुंच गया. तेज पानी के साथ आए मलबे ने स्कूल की इमारत और आसपास के ढांचों को अपनी चपेट में ले लिया. पुल और दूसरी संरचनाएं भी बाढ़ की ताकत के सामने टिक नहीं सकीं. अगर बच्चों को निकालने का फैसला कुछ देर से लिया जाता तो स्थिति कितनी भयावह हो सकती थी, इसका अंदाजा लगाना मुश्किल है. स्कूल की इमारत चली गई, लेकिन 1,643 बच्चों की जिंदगी बच गई. यही वजह है कि राजेंद्र दवाड़ी की कहानी नेपाल की इस त्रासदी के बीच उम्मीद की कहानी बनकर सामने आई है. बच्चों को बचाया, लेकिन स्कूल के दो लोग नहीं लौटे
इस बचाव अभियान की सबसे दर्दनाक बात यह रही कि स्कूल से जुड़े दो लोगों की जान नहीं बच सकी. स्कूल के 32 वर्षीय सोशल हिस्ट्री शिक्षक संतोष परियार बाढ़ में बह गए. बताया गया कि वह नदी किनारे स्थित अपने किराए के कमरे में खाना बनाने के लिए वापस गए थे. स्कूल के कर्मचारी सुल्तान लामा भी बाढ़ की चपेट में आ गए. वह स्कूल के दरवाजे बंद करने के लिए वापस गए थे. इस तरह एक तरफ 1,643 बच्चों के सुरक्षित बचने की राहत थी, तो दूसरी तरफ स्कूल के दो सदस्यों को खोने का गहरा दुख भी.
‘मैं और क्या कर सकता था?’… दवाड़ी का जवाब बना मिसाल
जब स्थानीय लोगों ने राजेंद्र दवाड़ी को हीरो कहना शुरू किया तो उन्होंने खुद अपनी भूमिका को बहुत सामान्य तरीके से देखा. तबाह हो चुके स्कूल की ओर देखते हुए उन्होंने कहा—“मैं और क्या कर सकता था?” लेकिन यही सादगी उनकी कहानी को और ज्यादा प्रभावशाली बनाती है. उस समय उनके सामने 1,643 बच्चों की जिम्मेदारी थी. उन्हें यह तय करना था कि बच्चों को कहां ले जाना है, कितनी जल्दी निकालना है और कैसे यह सुनिश्चित करना है कि कोई पीछे न छूटे. उन्होंने कुछ ही मिनटों में फैसला लिया और वही फैसला हजारों परिवारों के लिए सबसे बड़ी राहत बन गया.
आखिर इतनी खतरनाक कैसे बनी नेपाल की फ्लैश फ्लड?
इस तबाही के पीछे ग्लेशियर और चट्टान के बड़े हिस्से के टूटने की घटना को वजह बताया गया है. जानकारी के मुताबिक लांगटांग लिरुंग चोटी से बर्फ और चट्टान का एक विशाल हिस्सा टूटकर करीब 1,200 मीटर नीचे ल्हेंदे खोला नदी की ऊपरी घाटी में जा गिरा. इसके बाद नदी में अचानक भारी मात्रा में पानी और मलबा पहुंचा. देखते ही देखते फ्लैश फ्लड ने भयावह रूप ले लिया. इस पानी के साथ केवल मिट्टी नहीं थी. इसमें बर्फ, बड़े पत्थर और चट्टानों का मलबा भी शामिल था. यही वजह रही कि बाढ़ ने अपने रास्ते में आने वाले पुलों, इमारतों और दूसरे ढांचों को भारी नुकसान पहुंचाया.
करीब 50 एकड़ में फैला था टूटकर गिरा हिस्सा
भू-आकृति विज्ञान विशेषज्ञ डेनियल शुगर के अनुमान के मुताबिक ग्लेशियर से टूटकर गिरने वाला विशाल हिस्सा करीब 50 एकड़ क्षेत्र में फैला था. इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि पहाड़ से नीचे आया मलबा कितना बड़ा रहा होगा और उसने नदी की धारा को किस तरह प्रभावित किया होगा. कुछ ही समय में नदी का सामान्य बहाव एक विनाशकारी सैलाब में बदल गया.
नेपाल में 750 से ज्यादा मौतें, हजारों अब भी लापता
इस आपदा ने नेपाल के कई इलाकों को बुरी तरह प्रभावित किया है. उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक नेपाल में 750 से ज्यादा लोगों की मौत हो चुकी है, जबकि करीब 2,498 लोग लापता बताए जा रहे हैं. तिब्बत के जिरोंग काउंटी में भी सैकड़ों लोगों के लापता होने की जानकारी सामने आई है. कई इलाकों में राहत और बचाव अभियान जारी है. पहाड़ी इलाकों की भौगोलिक स्थिति और बाढ़ से क्षतिग्रस्त सड़कें तथा पुल रेस्क्यू टीमों के सामने बड़ी चुनौती बने हुए हैं. 2015 के जख्म भी इसी इलाके में जुड़े हैं नेपाल के लिए यह त्रासदी एक पुराने दर्द की याद भी दिलाती है. साल 2015 में 7.8 तीव्रता का भूकंप आया था, जिसमें नेपाल और दक्षिण एशिया के दूसरे हिस्सों में करीब 8,962 लोगों की मौत हुई थी. उसी आपदा के दौरान लांगटांग क्षेत्र भी भारी तबाही की चपेट में आया था. अब एक बार फिर इसी व्यापक इलाके में प्रकृति के कहर ने लोगों को झकझोर दिया है.
