भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) एक बार फिर पॉलिमर यानी प्लास्टिक बैंक नोट्स को लेकर गंभीर विचार कर रहा है. हाल ही में हुई केंद्रीय बैंक की बोर्ड बैठकों (पटना और मुंबई) में इस प्रस्ताव पर चर्चा हुई है. माना जा रहा है कि देश में नकदी की बढ़ती मांग को देखते हुए यह कदम उठाया जा सकता है.
बढ़ती कैश डिमांड ने बढ़ाई जरूरत
पिछले कुछ वर्षों में देश में करेंसी की मांग लगातार बढ़ी है. रिपोर्ट्स के अनुसार, Currency in Circulation (CiC) मई 2027 तक ₹42.86 ट्रिलियन के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गई है, जो सालाना आधार पर 11.5% की बढ़ोतरी दर्शाती है. डिजिटल पेमेंट के बढ़ने के बावजूद नकदी की मांग में कोई खास कमी नहीं आई है.
क्यों लाए जा सकते हैं पॉलिमर नोट?
सूत्रों के मुताबिक, RBI इस बदलाव पर इसलिए विचार कर रहा है क्योंकि- पॉलिमर नोट की प्रोडक्शन कॉस्ट लंबे समय में कम हो सकती है. इनकी लाइफ सामान्य पेपर नोट की तुलना में ज्यादा होती है. नकली नोटों के खिलाफ सुरक्षा भी बेहतर मानी जाती है. इसी वजह से एक पायलट प्रोजेक्ट जल्द शुरू किए जाने की संभावना जताई जा रही है.
छोटे नोटों की मांग ज्यादा, लेकिन सप्लाई कम
रिपोर्ट में यह भी सामने आया है कि पिछले कुछ सालों में ₹10 और ₹20 जैसे छोटे नोटों की मांग काफी बढ़ी है, लेकिन इनकी कुल करेंसी में हिस्सेदारी बेहद कम रही है. उदाहरण के तौर पर:
₹10 नोट का हिस्सा मात्र 0.7%
₹20 नोट का हिस्सा करीब 0.8%
सिक्कों को बढ़ावा देने की कोशिश नाकाम
RBI और सरकार ने पिछले कुछ वर्षों में सिक्कों के इस्तेमाल को बढ़ाने की कोशिश की, लेकिन अपेक्षित सफलता नहीं मिली. FY24 में जहां सिक्कों की संख्या 1.2 अरब थी, वहीं FY25 में यह बढ़कर 1.5 अरब हो गई. इनमें ₹5 और ₹20 सिक्कों की हिस्सेदारी सबसे ज्यादा रही.
पहले भी हुई थी कोशिश
साल 2012 में तत्कालीन UPA सरकार ने ₹10 के पॉलिमर नोट का पायलट प्रोजेक्ट शुरू करने की योजना बनाई थी, जिसे बाद में तकनीकी दिक्कतों के कारण रोक दिया गया था. उस समय इसका उद्देश्य नोटों की उम्र बढ़ाना था, न कि नकली नोट रोकना.
अब तकनीक तैयार, रास्ता आसान
सूत्रों का कहना है कि अब तकनीक पहले से काफी बेहतर हो चुकी है और ATM मशीनें भी ऐसे नोटों को पहचानने में सक्षम हो सकती हैं. इसलिए इस बार प्रोजेक्ट के आगे बढ़ने की संभावना ज्यादा मजबूत मानी जा रही है.
दुनिया के कई देशों में पहले से इस्तेमाल
पॉलिमर नोट पहले से ही कई देशों में चलन में हैं, जैसे-
ऑस्ट्रेलिया (पहला देश, 1988 से)
सिंगापुर, थाईलैंड, मलेशिया, इंडोनेशिया
रोमानिया (यूरोप में पहला देश)
कनाडा (2011 से) हालांकि अमेरिका में अब भी कपास-लिनन आधारित करेंसी ही उपयोग में है.
