अभिषेक ‘अजनबी‘
“They may kill me, but they cannot kill my ideas. They can crush my body, but they will not be able to crush my spirit.” “वे मुझे मार सकते हैं, लेकिन मेरे विचारों को नहीं. वे मेरे शरीर को कुचल सकते हैं, लेकिन मेरी आत्मा को नहीं”
~अमर शहीद भगत सिंह
शहीद-ए-आज़म भगत सिंह का यह कथन आज भी उतना ही मौजूं है, जितना अब से 95 वर्ष पहले था। ठीक उसी तरह ‘गांधीवाद’ भी है। जब भी कोई सरकार निरंकुश होती है, मजलूमों का दामन थामने की बजाय दमन करती है, तो ‘गांधीवाद’ स्वतः जीवित हो उठता है। शुरुआत किसी एक व्यक्ति से होती है, लेकिन यह तेजी से एक विशाल जनसमूह की रगों में दौड़ने लग जाता है।
30 जनवरी 1948 को नाथूराम गोडसे ने जब राष्ट्रपिता महात्मा गांधी का सीना गोलियों से छलनी किया, तो उसे भी इस बात का अंदाजा नहीं था कि मैं जिस शख्स को गोली मार रहा हूं; वो अब सिर्फ एक शख्स नहीं, वरन् विचार बन चुका है। यह विचार हर उस परिस्थिति में सामने आ खड़ा होगा, जब कोई सरकार अंग्रेजी हुकूमत सरीखी जवाबदेही से बचकर बर्बरता पर उतारू होगी।
1975 में जब इंदिरा गांधी ने दमनकारी नीति अपनाई तो जय प्रकाश नारायण के अंदर ‘गांधीवाद’ जीवित हो उठा। उन्होंने उस वक्त सत्ता के लोभ में निरंकुशता की राह पर चल पड़ीं इंदिरा गांधी के विरुद्ध अंहिसावादी ‘संपूर्ण क्रांति’ का बिगुल फूंका, आम जनमानस ने भी उनका साथ दिया और नतीजे के तौर पर इंदिरा गांधी को सत्ता से बेदखल होना पड़ा।
अब एक बार फिर NEET पेपर लीक और शिक्षा व्यवस्था की गड़बड़ियों को लेकर जंतर-मंतर पर Gen-Z की आवाज बुंलद हुई तो इसका ताज़तरीन उदाहरण भी सामने आ गया। 20 जून को राजधानी दिल्ली के जंतर-मंतर पर शुरू हुआ यह प्रदर्शन साधारण तरह से चल रहा था, न इस प्रदर्शन का ज्यादा जिक्र हो रहा था और न ही सरकार पर इसका कोई असर दिखाई दे रहा था; लेकिन तभी ‘गांधीवाद’ गूंज उठा।
छात्रों के इस प्रदर्शन से जुड़े वैज्ञानिक और पर्यवरण एक्टिविस्ट सोनम वांगचुक ने गांधीवादी रुख अपनाते हुए 28 जून को आमरण अनशन शुरू कर दिया। भूख से जैसे-जैसे वांगचुक का शरीर निढाल होता गया, उसी तरह गांधीवाद देश के युवाओं, जहीन इंसानों और विपक्षी सियासतदानों की रगों में रफ्तार के साथ दौड़ने लगा।
दूसरी तरफ, गोडसे के अनुयायियों वाला धड़ा सोनम वांगचुक को देशद्रोही, CIA का एजेंट और चीन का सरपरस्त बताने में जुट गया। वर्तमान में मशहूर हो चुका ‘विदेशी फंडिंग’ वाल एंगल भी सामने आया। आक्षेप आते रहे, लेकिन सोनम वांगचुक गांधीवादी सिद्धांत पर अटल रहे। उनका अनशन वाला अहिंसक प्रतिरोध जारी रहा।
वांगचुक के अनशन के 17 दिन बीत चुके थे। विपक्षी दलों के नेताओं का जंतर-मंतर पर पहुंचना शुरू हो गया था। देश की मशहूर हस्तियां भी सोनम वांगचुक के समर्थन में आ चुकी थीं। लेकिन सरकार के किसी नुमाइंदे ने जंतर-मंतर पहुंचकर सोनम वांगचुक का अनशन तुड़वाने या बातचीत करने को भी ज़रूरी नहीं समझा।
साल 1930 में नमक कानून के खिलाफ गांधी जी द्वारा निकाले गए ‘दांडी मार्च’ की तर्ज पर जंतर-मंतर से भी ‘संसद मार्च’ का ऐलान हो गया। 20 जुलाई को संसद के मॉनसून सत्र के पहले दिन यह मार्च होना था, लेकिन इससे ठीक दो दिन पहले सोनम वांगचुक को दिल्ली पुलिस ने जबरदस्ती जंतर-मंतर से उठाकर सफदरजंग अस्पताल पहुंचा दिया।
सोनम वांगचुक के साथ हुए इस सरकारी और बर्बर बर्ताव को देखकर एक आम जनता में एक आक्रोश फूट पड़ा। देश के कोने-कोने से युवा जंतर-मंतर पर पहुंच गए। 20 जुलाई को जब संसद मार्च के लिए छात्र निकले तो पुलिस प्रशासन के हाथ-पांव फूल गए। नतीजतन बर्बरता की एक और दहलीज पार कर छात्रों पर लाठियां बरसा दी गईं।
ख़बरों और तस्वीरों ने तो यह भी बयां किया कि छात्रों और प्रदर्शनकारी युवाओं पर पैलेट गन और शॉक बैटन का भी इस्तेमाल किया गया। सरकार के इस बर्ताव से कुछ छात्रों ने उग्र होकर पत्थरबाजी की, लेकिन बाद में वे फिर अहिंसा का रास्ता अपनाते हुए पुलिस द्वारा उजाड़ दिए गए जंतर-मंतर पर एक बार फिर से जुटने लगे।
आखिरकार सरकार को झुकना पड़ा। शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान को इस्तीफा देना पड़ा। छात्रों की शिक्षा व्यवस्था में सुधार की बात भी सरकार माननी पड़ी। इसके अलावा प्रदर्शनकारी युवाओं और छात्रों पर दर्ज किए गए मुकदमे वापस लेने और NEET पेपर लीक के चलते सुसाइड करने वाले छात्रों के परिजनों को मुआवजा दिए जाने का आश्वासन भी देना पड़ा।
महात्मा गांधी की मौत के 78 वर्ष बाद GEN-Z के दौर में एक बार फिर ‘गांधीवाद’ की जीत हुई। शांतिपूर्ण आंदोलन और उसके नेतृत्व को ‘राष्ट्रद्रोही’ बताने वाले, राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के बारे में ‘व्हाट्सएप यूनिवर्सिटी’ प्राप्त हुआ अ’ज्ञान उड़ेलने वाले गोडसे के अनुयायियों को पूर्ण पराजय मिली है।
वर्तमान समय में देश में कुछ चुनिंदा लोग ही ऐसे होंगे, जिन्होंने महात्मा गांधी को देखा हो। ऐसे लोगों की संख्या भी बहुत कम होगी, जिन्होंने महात्मा गांधी को विधिवत पढ़ा हो या आत्मसात किया होगा। लेकिन उनके विचार, उनका अहिंसावादी तरीका आज भी उतना ही मजबूत हथियार है जितना उनके समय में था। यानी जनरेशंस बदलती रहेंगी, लेकिन गांधी थे, गांधी हैं और गांधी जीवित रहेंगे।
“When I despair, I remember that all through history the way of truth and love have always won. There have been tyrants and murderers, and for a time, they can seem invincible, but in the end, they always fall. Think of it–always.”
“जब मैं निराश होता हूँ, तो मुझे याद आता है कि इतिहास में सत्य और प्रेम का मार्ग हमेशा विजयी रहा है। अत्याचारी और हत्यारे हुए हैं, और कुछ समय के लिए वे अजेय प्रतीत हो सकते हैं, लेकिन अंत में वे हमेशा गिरते हैं। इस बात को हमेशा याद रखना।”
~महात्मा गांधी
डिस्क्लेमर: उपरोक्त लेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी हैं.
