उत्तर प्रदेश

गंगा-यमुना में नहीं जाएगा गंदा पानी! जल शक्ति मंत्री स्वतंत्र देव सिंह ने अफसरों को दिए सख्त निर्देश

स्वतंत्र देव सिंह ने नमामि गंगे तथा ग्रामीण जलापूर्ति विभाग की बड़ी समीक्षा बैठक में अधिकारियों को साफ संदेश दिया कि प्रदेश की नदियों में अब बिना शोधन का पानी नहीं जाना चाहिए। जल निगम (ग्रामीण) के सभागार में हुई इस उच्चस्तरीय बैठक में जल निगम, राज्य पेयजल एवं स्वच्छता मिशन, भूजल विभाग, राज्य स्वच्छ गंगा मिशन और लघु सिंचाई विभाग के वरिष्ठ अधिकारी मौजूद रहे।

बैठक के दौरान मंत्री ने गंगा और यमुना किनारे बसे बड़े शहरों में सीवेज ट्रीटमेंट सिस्टम को मजबूत करने, ग्रामीण जलापूर्ति योजनाओं को तेज़ी से पूरा करने और गुणवत्ता प्रभावित जिलों में शुद्ध पेयजल उपलब्ध कराने पर विशेष जोर दिया। उन्होंने कहा कि सरकार की प्राथमिकता है कि हर ग्रामीण तक स्वच्छ पेयजल पहुंचे और जल संरक्षण के प्रयासों को और अधिक प्रभावी बनाया जाए।

क्या STP परियोजनाओं में देरी पर अब होगी सख्ती?

मंत्री ने नमामि गंगे के तहत निर्माणाधीन सीवेज शोधन संयंत्रों (STP) की समीक्षा करते हुए निर्देश दिया कि सभी परियोजनाएं तय समयसीमा के भीतर पूरी की जाएं। उन्होंने अधिकारियों से कहा कि किसी भी “माइल स्टोन” में देरी नहीं होनी चाहिए और इसके लिए मजबूत मॉनिटरिंग व्यवस्था बनाई जाए।

उन्होंने विशेष रूप से प्रयागराज, वाराणसी, कानपुर, मथुरा और आगरा जैसे गंगा-यमुना तट के बड़े शहरों के साथ लखनऊ, अयोध्या और गोरखपुर में भी सीवेज संयंत्रों को जरूरत के अनुसार सुदृढ़ करने के निर्देश दिए, ताकि कोई भी नाला बिना ट्रीटमेंट के नदियों में न पहुंचे।

छोटी नदियों को पुनर्जीवित करने के लिए क्या है सरकार की नई योजना?

बैठक में “Forestry River Rejuvenation” योजना के तहत छोटी नदियों के पुनर्स्थापन पर भी चर्चा हुई। मंत्री ने कहा कि “रिवर बेसिन पुनर्जनन नीति” से जुड़े सभी विभागों के बीच बेहतर समन्वय बनाया जाए और समय-समय पर प्रगति की समीक्षा करते हुए कार्यों को तेजी से लागू किया जाए।

उन्होंने साफ किया कि नदी संरक्षण केवल एक विभाग की जिम्मेदारी नहीं, बल्कि कई विभागों की संयुक्त भागीदारी से ही इसे सफल बनाया जा सकता है।

क्या ग्रामीण क्षेत्रों में जलापूर्ति व्यवस्था को और मजबूत किया जाएगा?

मंत्री ने ग्रामीण क्षेत्रों में जल जीवन मिशन और जल निगम (ग्रामीण) की योजनाओं को और प्रभावी बनाने पर जोर दिया। उन्होंने अधिकारियों को निर्देश दिया कि ग्रामीणों को जलापूर्ति से जुड़ी समस्याओं का समय पर समाधान उपलब्ध कराया जाए और योजनाओं का लाभ अधिक से अधिक लोगों तक पहुंचे।

उन्होंने कहा कि ग्रामीण क्षेत्रों में पेयजल आपूर्ति व्यवस्था में किसी भी प्रकार की लापरवाही बर्दाश्त नहीं की जाएगी।

गुणवत्ता प्रभावित जिलों में क्या होंगे बड़े बदलाव?

मंत्री ने झांसी, मथुरा, एटा, अयोध्या, वाराणसी, गाजीपुर और अमेठी जैसे गुणवत्ता एवं मात्रा (Q & Q) प्रभावित जिलों की समीक्षा करते हुए निर्देश दिया कि ग्रामीण जल योजनाओं के तहत लगाए गए 8000 से अधिक टाइप स्टेप पोस्ट (COTOF900110) जल्द पूरी तरह संचालित किए जाएं।

उन्होंने कहा कि जिन यूनिटों में मरम्मत या तकनीकी जांच की जरूरत है, उन्हें अगले 15 दिनों के भीतर दुरुस्त किया जाए ताकि लोगों को शुद्ध पेयजल मिल सके।

इसके अलावा मंत्री ने आर्सेनिक रिमूवल यूनिट (ASRO420) और फ्लोराइड रिमूवल यूनिट (FRO34020) को भी पूरी तरह क्रियाशील करने के निर्देश दिए, जिससे गुणवत्ता प्रभावित क्षेत्रों में सुरक्षित पेयजल उपलब्ध कराया जा सके।

क्या यूपी में भूजल संकट कम हो रहा है?

भूगर्भ जल विभाग की समीक्षा के दौरान मंत्री ने बताया कि पिछले 8-9 वर्षों में अतिदोहन श्रेणी वाले विकास खंडों की संख्या में उल्लेखनीय कमी आई है। वर्ष 2017 में जहां प्रदेश के 82 विकास खंड अतिदोहन श्रेणी में थे, वहीं वर्ष 2025 के आकलन में यह संख्या घटकर 44 रह गई है। उन्होंने इसका श्रेय केंद्र और राज्य सरकार द्वारा चलाई जा रही जल संचयन योजनाओं और विभिन्न विभागों के संयुक्त प्रयासों को दिया।

भूजल संकट वाले शहरों में अब क्या होगा?

मंत्री ने निर्देश दिया कि प्रदेश के उन 10 शहरों में, जहां भूजल की स्थिति बेहद संकटग्रस्त है, वहां व्यापक जागरूकता अभियान चलाया जाए। इसके लिए जिला प्रशासन, औद्योगिक निकायों, गैर सरकारी संगठनों और शैक्षिक संस्थानों के सहयोग से कार्यशालाएं आयोजित की जाएं। उन्होंने कहा कि भूजल संरक्षण को जन आंदोलन बनाकर ही बेहतर परिणाम हासिल किए जा सकते हैं।

Ravi Mishra

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