संवाददाता- रवि मिश्रा
Rewa News: हमारे देश के राजनेता अक्सर अमेरिका, चीन और जापान जैसे विकसित देशों की आधुनिक सड़कों और पुलों की चर्चा करते हैं। लेकिन भारत के दिल मध्य प्रदेश के रीवा जिले का एक ऐसा गांव भी है, जहां आज भी लोग अपनी जान हथेली पर रखकर नदी पार करने को मजबूर हैं।
रीवा जिले की ग्राम पंचायत रौली में नदी पर पक्का पुल नहीं होने की वजह से ग्रामीणों ने मजबूरी में लकड़ियां जोड़कर एक अस्थायी पुल बना लिया है। यह पुल किसी इंजीनियर की योजना से नहीं, बल्कि गांव वालों की बेबसी से बना है। हर दिन इसी डगमगाते पुल पर बच्चों के सपने, बुजुर्गों की उम्मीदें और महिलाओं की जिंदगी दांव पर लगी रहती है।
स्कूल हो या अस्पताल… हर रास्ता ‘मौत के पुल’ से होकर गुजरता है
अगर गांव के किसी बच्चे को स्कूल जाना हो, किसी किसान को खेत पहुंचना हो, किसी परिवार को बाजार से राशन लाना हो या किसी गर्भवती महिला को अचानक अस्पताल ले जाना हो, तो सभी को इसी लकड़ी के पुल का सहारा लेना पड़ता है।
बरसात में जब नदी का जलस्तर बढ़ता है, तब यह पुल और भी खतरनाक हो जाता है। एक छोटी सी चूक किसी बड़े हादसे में बदल सकती है, लेकिन ग्रामीणों के पास कोई दूसरा रास्ता नहीं है।
सालों से लगाई गुहार, फिर भी नहीं बना पक्का पुल
ग्रामीणों का कहना है कि उन्होंने कई बार प्रशासन और जनप्रतिनिधियों से पक्के पुल की मांग की, लेकिन आज तक उनकी आवाज सुनने वाला कोई नहीं मिला। आखिरकार गांव वालों ने खुद श्रमदान कर लकड़ियों का पुल तैयार किया, ताकि रोजमर्रा की जिंदगी किसी तरह चल सके। लेकिन सवाल यह है कि क्या 21वीं सदी के भारत में किसी गांव के लोगों को अपनी जान जोखिम में डालकर इस तरह सफर करने के लिए मजबूर होना चाहिए?
तरक्की के दावों के बीच एक कड़वी हकीकत
एक तरफ देश विकास और आधुनिक इंफ्रास्ट्रक्चर के बड़े-बड़े दावे करता है, वहीं रीवा का यह गांव आज भी एक सुरक्षित पुल का इंतजार कर रहा है। यहां हर दिन बच्चे अपनी किताबों के साथ मौत का खतरा भी उठाते हैं, महिलाएं डर के साए में नदी पार करती हैं और बुजुर्ग कांपते कदमों से इस पुल पर चलते हैं।
यह सिर्फ एक पुल की कहानी नहीं, बल्कि उन हजारों ग्रामीणों की पीड़ा है जो आज भी बुनियादी सुविधाओं से वंचित हैं। अब देखना यह होगा कि प्रशासन इस दर्द को कब महसूस करता है और कब इस गांव को ‘मौत के पुल’ से मुक्ति मिलती है।
