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Viral News: ‘बच्चे चाहिए सुंदर तो खाना होगा कुत्ते का…’ गर्भवर्ती महिलाओं के लिए जानें क्या कहती है ये रिपोर्ट

Viral News: गर्भावस्था के दौरान महिला और उसके गर्भ में पल रहे बच्चे के लिए यह समय विशेष रूप से महत्वपूर्ण होता है। डॉक्टर इस दौरान खास देखभाल और सही डाइट लेने की सलाह देते हैं. हाल ही में चीन से एक अजीब खबर सामने आई है, जो गर्भवती महिलाओं को हैरान कर रही है.

गर्भावस्था के दौरान अंधविश्वास: चीन की अद्भुत परंपराएँ

सफेद बालों वाले कुत्ते का सिर- चीन की एक रिपोर्ट में दावा किया गया है कि गर्भवती महिलाओं को सफेद बालों वाले कुत्ते (बायमुगौ) का सिर उबालकर खाना चाहिए. यह मान्यता है कि ऐसा करने से उनका बच्चा अधिक सुंदर और अच्छी तरह से विकसित होगा. हालांकि, कोई भी चिकित्सा विशेषज्ञ या डिलीवरी डॉक्टर इस तरह की सलाह नहीं देता। यह अंधविश्वास चीन की प्राचीन परंपराओं से जुड़ा हुआ है.

प्रसव से जुड़े चीन के अजीब अंधविश्वास

  1. चावल का छोटा कटोरा: कुछ पारंपरिक मान्यताओं के अनुसार, गर्भवती महिलाओं को छोटे चावल के कटोरे का उपयोग करने की सलाह दी जाती है ताकि बच्चे का सिर छोटा रहे.
  2. दही और सूखी बीन्स: गर्भवती महिलाओं को दही और सूखी बीन्स खाने की सलाह दी जाती है ताकि भ्रूण की झिल्लियां अधिक मोटी न हों.
  3. चाकू छूने की प्रथा: प्रसव के समय दाई को रसोई में जाकर चाकू छूने की सलाह दी जाती है ताकि बच्चे को बुरी आत्माओं से दूर रखा जा सके.

खाने-पीने से जुड़े मिथक:

इन काली चीजों का सेवन करने से बच्चे की त्वचा का रंग गहरा हो सकता है, जबकि दूध, बादाम, और सूखे सोया पेस्ट का सेवन बच्चे के रंग को निखारने के लिए माना जाता है. एक और भ्रांति यह है कि भेड़ के बच्चे (मेमने) का मांस खाने से बच्चे को मिर्गी हो सकती है, लेकिन विशेषज्ञ इसे बेतुका मानते हैं.

प्रसव के बाद के अंधविश्वास:

गर्म चीजें और अदरक का पानी- प्रसव के बाद महिलाओं को गर्म चीजें खाने, अदरक के पानी से नहाने, और जड़ी-बूटियों से बनी चाय पीने की सलाह दी जाती है. प्राचीन समय में ऐसा माना जाता था कि डिलीवरी के बाद मां और शिशु पर बुरी आत्माओं का साया हो सकता है, इसलिए उन्हें बाहर जाने से रोका जाता था. आजकल, यह मुख्य रूप से संक्रमण से बचाव के लिए किया जाता है.

इन अंधविश्वासों और मिथकों के बावजूद, गर्भवती महिलाओं को सही देखभाल और चिकित्सा सलाह पर ध्यान देना चाहिए. समय के साथ ये परंपराएँ बदल रही हैं, लेकिन कुछ परिवार अभी भी इन्हें मानते हैं.

Sagar Dwivedi

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