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सुप्रीम कोर्ट ज्ञानेश कुमार को निलंबित करने से किया इनकार, लेकिन चुनाव आयोग से मांगा जवाब

नई दिल्ली: मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार की कार्यशैली को लेकर चल रहे विवाद में सुप्रीम कोर्ट ने फिलहाल उन्हें हटाने या निलंबित करने का आदेश नहीं दिया है। कोर्ट ने कहा कि पहले चुनाव आयोग और दूसरे संबंधित लोगों का जवाब सुना जाएगा। मामला इस आरोप से जुड़ा है कि चुनाव आयोग के कुछ अहम फैसले क्या दूसरे चुनाव आयुक्तों की सहमति के बिना लिए गए? सुप्रीम कोर्ट अब इसी सवाल पर चुनाव आयोग का पक्ष जानना चाहता है।

सीधे शब्दों में कहें तो सवाल सिर्फ ज्ञानेश कुमार को लेकर नहीं है, बल्कि चुनाव आयोग के फैसले लेने के तरीके को लेकर है। अगर तीन सदस्यीय चुनाव आयोग में किसी बड़े फैसले पर सभी की राय जरूरी है, तो क्या ऐसा हुआ या नहीं? सुप्रीम कोर्ट ने साफ संकेत दिया है कि अगर जवाब से यह सामने आता है कि कुछ फैसले जरूरी सहमति के बिना लिए गए थे, तो उन फैसलों पर दोबारा विचार किया जा सकता है।

आखिर पूरा विवाद क्या है?

यह मामला मतदाता सूची में बदलाव के लिए चल रही स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन यानी SIR से जुड़ा है। याचिकाकर्ताओं का आरोप है कि इस दौरान कुछ फैसले CEC ने अकेले लिए, जबकि चुनाव आयोग एक बहुसदस्यीय संस्था है। दूसरी तरफ चुनाव आयोग का कहना है कि SIR के कार्यक्रम से जुड़े फैसले सर्वसम्मति से लिए गए थे और अधिकारियों की ओर से उठाए गए सवाल सामान्य प्रक्रिया का हिस्सा थे।

क्या सच में दूसरे चुनाव आयुक्तों ने आपत्ति जताई थी?

यही इस विवाद का एक अहम हिस्सा है। इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक, चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने करीब 10 महीनों में कम से कम 14 मौकों पर मतदाता सूची, वोटर रजिस्ट्रेशन और चुनाव आयोग की तकनीकी व्यवस्था से जुड़े मामलों पर आपत्ति या सवाल उठाए थे। हालांकि, चुनाव आयोग ने इसे आपसी या संस्थागत टकराव मानने से इनकार किया है। आयोग का कहना है कि किसी भी फैसले से पहले सवाल या सुझाव देना सामान्य प्रशासनिक प्रक्रिया है।

सुप्रीम कोर्ट में सरकार और आयोग से जवाब क्यों मांगा गया?

याचिका में आरोप लगाया गया है कि चुनाव आयोग जैसे संवैधानिक संस्थान में फैसले तय नियमों के मुताबिक सामूहिक रूप से लिए जाने चाहिए। याचिकाकर्ताओं ने CEC के खिलाफ कार्रवाई और उनके कामकाज पर रोक लगाने जैसी मांगें भी रखी हैं। लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने अभी इन आरोपों को सही नहीं माना है। कोर्ट पहले संबंधित पक्षों का जवाब लेना चाहता है और उसके बाद मामले पर आगे फैसला करेगा।

Ravi Mishra

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