राजधानी दिल्ली एक बार फिर लापरवाही की भेंट चढ़ गई। खुले मैनहोल और बिना चेतावनी गड्ढों ने ऐसा खौफनाक चेहरा दिखाया कि महज पांच दिनों के भीतर दो लोगों की जान चली गई। सवाल वही पुराना है आखिर कब जागेंगे जिम्मेदार विभाग?
दिल्ली के रोहिणी सेक्टर-32 में सोमवार रात एक दर्दनाक हादसा हुआ। 30 वर्षीय मजदूर बिरजू कुमार अपने एक दोस्त के साथ घर लौट रहा था, तभी वह महाशक्ति काली मंदिर के पास डीडीए की जमीन पर बने खुले मैनहोल में गिर गया। दोनों मजदूर दिनभर शराब पी चुके थे और नशे की हालत में थे।
बिरजू के साथ मौजूद दोस्त ने बताया कि उसने उसे आवाज दी, लेकिन कोई जवाब नहीं मिला। ज्यादा नशे में होने के कारण वह मदद के लिए कुछ नहीं कर सका और घर चला गया। अगले दिन भी जब बिरजू का कोई पता नहीं चला तो पुलिस और फायर ब्रिगेड ने सर्च ऑपरेशन शुरू किया। मैनहोल के पास उसकी चप्पलें मिलीं और मंगलवार शाम करीब 4 बजे शव सीवर से बरामद किया गया। बिरजू मूल रूप से बिहार के समस्तीपुर का रहने वाला था।
घटना के बाद संबंधित मैनहोल को ढक दिया गया, लेकिन सवाल यह है कि हादसे से पहले यह खुला क्यों छोड़ा गया था? अगर समय रहते सुरक्षा इंतजाम होते तो शायद एक जान बच सकती थी।
बिरजू की मौत से ठीक पांच दिन पहले, 5 फरवरी को जनकपुरी इलाके में 25 वर्षीय बाइक सवार कमल ध्यानी दिल्ली जल बोर्ड द्वारा खोदे गए करीब 15 फीट गहरे गड्ढे में गिर गया था। न तो वहां चेतावनी बोर्ड थे और न ही बैरिकेडिंग। अगली सुबह उसकी लाश और बाइक गड्ढे से बरामद हुई। इस मामले में एफआईआर दर्ज हुई और कई जल बोर्ड अधिकारियों को सस्पेंड किया गया।
पिछले महीने नोएडा में भी एक सॉफ्टवेयर इंजीनियर की जान इसी तरह की लापरवाही में चली गई थी। घने कोहरे में उसकी कार नाले में गिर गई और समय रहते रेस्क्यू न होने से उसकी मौत हो गई।
लगातार हो रहे ऐसे हादसे यह साबित करते हैं कि दिल्ली और एनसीआर में खुले मैनहोल और बिना सुरक्षा गड्ढे आम लोगों की जान के दुश्मन बन चुके हैं। हादसे के बाद कार्रवाई होती है, लेकिन उससे पहले जिम्मेदारी तय क्यों नहीं होती यही सबसे बड़ा सवाल है।
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