Sahir Ludhianvi Sher : ‘तुम मेरे लिए अब कोई इल्ज़ाम न ढूँडो…’ साहिर लुधियानवी के चुनिंदा शेर


इश्क़

तुम मेरे लिए अब कोई इल्ज़ाम न ढूँडो, चाहा था तुम्हें इक यही इल्ज़ाम बहुत है.

औरत

औरत ने जनम दिया मर्दों को मर्दों ने उसे बाज़ार दिया, जब जी चाहा मसला कुचला जब जी चाहा धुत्कार दिया.

मय-कशी

बे पिए ही शराब से नफ़रत, ये जहालत नहीं तो फिर क्या है

महबूब

तुम हुस्न की ख़ुद इक दुनिया हो शायद ये तुम्हें मालूम नहीं, महफ़िल में तुम्हारे आने से हर चीज़ पे नूर आ जाता है.

इश्क़

वैसे तो तुम्हीं ने मुझे बर्बाद किया है, इल्ज़ाम किसी और के सर जाए तो अच्छा.

उदासी

हम ग़म-ज़दा हैं लाएँ कहाँ से ख़ुशी के गीत, देंगे वही जो पाएँगे इस ज़िंदगी से हम.

अम्न

जंग तो ख़ुद ही एक मसअला है, जंग क्या मसअलों का हल देगी.

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