Majrooh Sultanpuri: ‘लोग साथ आते गए और कारवाँ बनता गया…’मजरूह सुल्तानपुरी की शायरी
Ravi Mishra
January 14, 2024
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प्रेरणादायक
मैं अकेला ही चला था जानिब-ए-मंज़िल मगर, लोग साथ आते गए और कारवाँ बनता गया.
अदाओं पे फ़िदा
ऐसे हँस हँस के न देखा करो सब की जानिब, लोग ऐसी ही अदाओं पे फ़िदा होते हैं.
सहारा
कोई हम-दम न रहा कोई सहारा न रहा, हम किसी के न रहे कोई हमारा न रहा.
जोश
देख ज़िंदाँ से परे रंग-ए-चमन जोश-ए-बहार, रक़्स करना है तो फिर पाँव की ज़ंजीर न देख.
इंतिज़ार
शब-ए-इंतिज़ार की कश्मकश में न पूछ कैसे सहर हुई, कभी इक चराग़ जला दिया कभी इक चराग़ बुझा दिया.
ज़िक्र
जफ़ा के ज़िक्र पे तुम क्यूँ सँभल के बैठ गए, तुम्हारी बात नहीं बात है ज़माने की.
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