Waseem Barelvi Shayari: अपने चेहरे से जो ज़ाहिर है छुपाएँ कैसे…वसीम बरेलवी के फेमस शेर


ग़म

अपने चेहरे से जो ज़ाहिर है छुपाएँ कैसे, तेरी मर्ज़ी के मुताबिक़ नज़र आएँ कैसे.

रौशनी

जहाँ रहेगा वहीं रौशनी लुटाएगा, किसी चराग़ का अपना मकाँ नहीं होता.

ग़म

तुझे पाने की कोशिश में कुछ इतना खो चुका हूँ मैं, कि तू मिल भी अगर जाए तो अब मिलने का ग़म होगा.

घमंड

आसमाँ इतनी बुलंदी पे जो इतराता है, भूल जाता है ज़मीं से ही नज़र आता है.

अंदाज़ा

दुख अपना अगर हम को बताना नहीं आता, तुम को भी तो अंदाज़ा लगाना नहीं आता.

ए'तिबार

वो झूट बोल रहा था बड़े सलीक़े से, मैं ए'तिबार न करता तो और क्या करता.

चराग़

रात तो वक़्त की पाबंद है ढल जाएगी, देखना ये है चराग़ों का सफ़र कितना है.

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