Gulzar Shayari : रुके रुके से क़दम रुक के बार बार चले, गुलज़ार के बेहतरीन शेर
Sagar Dwivedi
June 13, 2024
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उम्मीद
चंद उम्मीदें निचोड़ी थीं तो आहें टपकीं, दिल को पिघलाएँ तो हो सकता है साँसें निकलें.
पुकारता
देर से गूँजते हैं सन्नाटे, जैसे हम को पुकारता है कोई.
जुदाई
रुके रुके से क़दम रुक के बार बार चले, क़रार दे के तिरे दर से बे-क़रार चले.
पल
राख को भी कुरेद कर देखो, अभी जलता हो कोई पल शायद.
उम्र
वो उम्र कम कर रहा था मेरी, मैं साल अपने बढ़ा रहा था.
अजनबी
वो एक दिन एक अजनबी को, मिरी कहानी सुना रहा था.
चेहरा
आँखों के पोछने से लगा आग का पता, यूँ चेहरा फेर लेने से छुपता नहीं धुआँ.
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