छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने 16 फरवरी को एक अहम फैसले में कहा कि अगर किसी मामले में पेनिट्रेशन (यौन अंग का अंदर प्रवेश) साबित नहीं होता है, तो उसे भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 375 के तहत ‘रेप’ नहीं माना जा सकता। ऐसे मामलों में इसे ‘रेप की कोशिश’ माना जाएगा और IPC की धारा 376/511 के तहत सज़ा दी जाएगी। यह फैसला जस्टिस नरेंद्र कुमार व्यास की बेंच ने सुनाया।
कोर्ट ने क्या कहा?
कोर्ट ने साफ कहा कि रेप के अपराध के लिए पेनिट्रेशन जरूरी शर्त है। सिर्फ इजैक्युलेशन (वीर्य स्राव) या यौन अंग को बाहर से रगड़ना रेप नहीं माना जाएगा।
कोर्ट के मुताबिक, रेप साबित करने के लिए यह दिखाना जरूरी है कि आरोपी का यौन अंग महिला के शरीर के अंदर प्रवेश कर गया था। अगर पेनिट्रेशन नहीं हुआ, तो मामला रेप नहीं बल्कि रेप की कोशिश का होगा।
मामला क्या था?
सरकारी वकील के अनुसार, 21 मई 2004 को आरोपी ने पीड़िता का हाथ पकड़कर उसे जबरन अपने घर ले गया। वहां उसके कपड़े उतारे, यौन शोषण किया, फिर उसे कमरे में बंद कर दिया और उसके हाथ-पैर बांध दिए।
इस मामले में FIR दर्ज हुई और जांच के बाद आरोपी के खिलाफ चार्जशीट दाखिल की गई। धमतरी की अदालत ने उसे IPC की धारा 376(1) (रेप) और 342 (गैरकानूनी तरीके से बंधक बनाना) के तहत दोषी ठहराया था। आरोपी ने इस फैसले को हाईकोर्ट में चुनौती दी।
गवाही और मेडिकल रिपोर्ट
ट्रायल के दौरान पीड़िता ने एक बयान में कहा कि आरोपी ने पेनिट्रेशन किया, लेकिन दूसरे हिस्से में कहा कि आरोपी ने लगभग 10 मिनट तक अपना यौन अंग बाहर से रखा, अंदर नहीं डाला।
मेडिकल जांच में पाया गया कि पीड़िता का हाइमन सुरक्षित था। डॉक्टर ने साफ रेप की पुष्टि नहीं की, हालांकि हल्के पेनिट्रेशन की संभावना से इनकार भी नहीं किया। अंडरगारमेंट में मानव शुक्राणु (स्पर्म) मिलने की बात भी सामने आई।
2013 संशोधन से पहले का कानून
कोर्ट ने बताया कि 2013 में कानून में संशोधन से पहले IPC की धारा 375 के तहत रेप के लिए पेनिट्रेशन जरूरी था। हल्का पेनिट्रेशन भी रेप माना जा सकता है, लेकिन उसके लिए ठोस और साफ सबूत जरूरी हैं।
कोर्ट का अंतिम निष्कर्ष
कोर्ट ने कहा कि आरोपी के कृत्य ‘तैयारी’ से आगे बढ़कर ‘कोशिश’ की श्रेणी में आते हैं। उसने जबरन कमरे में ले जाकर यौन संबंध बनाने की कोशिश की, लेकिन पेनिट्रेशन साफ तौर पर साबित नहीं हुआ। इसलिए उसे रेप का दोषी नहीं, बल्कि ‘रेप की कोशिश’ का दोषी माना गया।
सज़ा में बदलाव
हाईकोर्ट ने आरोपी की सज़ा बदलते हुए IPC की धारा 376(1) के बजाय धारा 376/511 के तहत दोषी ठहराया। उसे 3 साल 6 महीने की सज़ा और 200 रुपये जुर्माना लगाया गया। IPC की धारा 342 के तहत दी गई सज़ा बरकरार रखी गई। चूंकि आरोपी जमानत पर है, इसलिए उसे बाकी सज़ा काटने के लिए ट्रायल कोर्ट में सरेंडर करने का आदेश दिया गया है।
